आचार्य पाणिनि
आचार्य पाणिनि
पाणिनि संस्कृत भाषा के प्रसिद्ध और श्रेष्ठ व्याकरणाचार्य हैं। उनके अष्टाध्यायी नामक ग्रन्थ के आठ अध्याय हैं। हर अध्याय में चार पाद हैं। प्रत्येक पाद में प्रस्तुत विषय के अनुसार कम अथवा अधिक सूत्र संख्या है। अत्यन्त संक्षेप में कहे हुए नियम अथवा विधान को सूत्र कहते हैं। अत्यंत संक्षिप्त होना ही पाणिनीय सूत्रों का सबसे निराला वैशिष्ट्य है। उस संक्षेप के लिए महर्षि पाणिनी ने एक स्वतंत्र पद्धति तैयार की है। फलस्वरूप सूत्रों की अधिकांश रचना अत्यधिक तकनीकी और लोक व्यवहार की भाषा से भिन्न हो गई है। पाणिनी सूत्र की भाषा संस्कृत होते हुए भी संस्कृत भाषा के अच्छे ज्ञान मात्र से सूत्रार्थ का ज्ञान असंभव है: तथापि यह व्याकरण बहुत संक्षिप्त हो गया है, बल्कि कुछ एक हद तक दुर्बोध भी हो गया है, फिर भी एक-एक सूत्र से बड़ा शब्द समूह सिद्ध हो जाता है। यह एक बड़ा लाभ है।

जीवन परिचय

पाणिनि (500 ईसा पूर्व) संस्कृत व्याकरण शास्त्र के सबसे बड़े प्रतिष्ठाता और नियामक आचार्य थे। इनका जन्म पंजाब के शालातुला में हुआ था जो आधुनिक पेशावर (पाकिस्तान) के क़रीब तत्कालीन उत्तर भारत के गांधार में हुआ था। इनका जीवनकाल 520-460 ईसा पूर्व माना जाता है। इनकी रचना को अष्टाध्यायी कहते हैं। इन्होंने भाषा के शुद्ध प्रयोगों की सीमा का निर्धारण किया, जो प्रयोग अष्टाधायायी की कसौटी पर खरे नहीं उतरे और उन्हें विद्वानों ने 'अपणिनीय' कहकर अशुद्ध घोषित कर दिया। संस्कृत भाषा को व्याकरण सम्मत रूप देने में पाणिनि का योगदान अतुलनीय माना जाता है।

अष्टाध्यायी में छिपा है भारतीय समाज

अष्टाध्यायी मात्र व्याकरण ग्रंथ नहीं है। इसमें प्रकारांतर से तत्कालीन भारतीय समाज का पूरा चित्र मिलता है। उस समय के भूगोल, सामाजिक, आर्थिक, शिक्षा और राजनीतिक जीवन, दार्शनिक चिंतन, ख़ान-पान, रहन-सहन आदि के प्रसंग स्थान-स्थान पर अंकित हैं। पाणिनि का समय ईसा पूर्व 800 से 400 के मध्य है, यद्यपि विद्वान् पाणिनि का समय भगवान बुद्ध से पूर्व बताते हैं, तो दूसरे कहते हैं कि बुद्ध भगवान के बाद हुए। अर्थरहित और अत्यन्त संक्षिप्त रि, धु, भ, ध इत्यादि संज्ञाएं पाणिनि तन्त्र की एक अद्वितीय विशेषता है। इस प्रकार के अनेक कारणों से पाणिनि का व्याकरण शास्त्र अनेक वैशेष्ट्यों की खान और व्याकरणकारों के लिए एक आदर्श बन गया है।

प्राचीन कथाओं में उल्लेख

पाणिनी का जीवन वृत्त अत्यन्त स्वल्प रूप में मिलता है। अष्टाध्यायी की पतंजलि रचित टीका, महाभाष्य में उसके विषय में कई उल्लेख आए हैं। पारम्पारिक लोक कथाओं से स्वल्परूप में जो कुछ ज्ञात है, उसे ऐतिहासिक सत्य समझना भूल होगी। महाभाष्यकार पतंजलि पाणिनि को दाक्षिपुत्र कहते हैं। नर्मदा नदी के उत्तरवर्ती भारत में पाणिनि ने प्रवास किया और उस समय प्रचलित संस्कृत भाषा और उपभाषाओं का उन्होंने बहुत सूक्ष्म अध्ययन किया। पाणिनि ने उस समय उपलब्ध वेद सूत्रादि वाङ्मय का भी गहरा अध्ययन किया होगा। यह बात उनके सूत्रों में उल्लिखित बातों से भली प्रकार से ज्ञात होती है। पाणिनि के पूर्व अनेक व्याकरणकार हो चुके थे, परन्तु उनके व्याकरणों में बहुत अधूरापन था और विशेष प्रदेश, शाखा, सम्प्रदाय की भाषा का ही उनके व्याकरण में विमर्श किया गया था। पाणिनि का व्याकरण सर्वसमावेशक होने से महाभाष्यकार उस व्याकरण को सर्ववेद 'परिषद' यानी सर्ववेद शाखा और सभी परम्पराओं का संग्राहक कहकर अन्य पूर्व व्याकरणों से उसका वैशिष्टय स्पष्ट से बताते हैं। प्राचीन काल में भारत देश में व्याकरण शास्त्र का अन्य शास्त्रों से सम्बन्ध बहुत गहरा माना जाता था। व्याकरण और न्याय ये दो शास्त्र ग्रन्थ सब शास्त्रों के अध्ययन के लिए अत्यावश्यक समझे जाते थे। विशेषत: तत्वज्ञान से व्याकरण शास्त्र का सम्बन्ध दो कारणों से होता है। तत्वज्ञान वस्तुओं और घटनाओं का यथार्थ ज्ञान है। किसी भी वस्तु का सही स्वरूप विचार से ही निश्चित करना सम्भव है। विचारों का माध्यम शब्द है और यह जितना समुचित हो उतना ही विचार में निश्चितता होती है। ऐसे अत्यन्त समुचित शब्दों का ज्ञान व्याकरण शास्त्र से सम्भव है।

व्याकरण शास्त्र और प्रशंसा

पाणिनि ने अपने समय की संस्कृत भाषा की सूक्ष्म छानबीन की थी। इस छानबीन के आधार पर उन्होंने जिस व्याकरण शास्त्र का प्रवचन किया, वह न केवल तत्कालीन संस्कृत भाषा का नियामक शास्त्र बना, अपितु उसने आगामी संस्कृत रचनाओं को भी प्रभावित किया। पाणिनि से पूर्व भी व्याकरण शास्त्र के अन्य आचार्यों ने इस विशाल संस्कृत भाषा को नियमों में बांधने का प्रयास किया था, परन्तु पाणिनि का शास्त्र विस्तार और गाम्भीर्य की दृष्टि से इन सभी में सिरमौर सिद्ध हुआ। पाणिनि ने अपनी गहन अन्तदृर्ष्टि, समन्वयात्मक दृष्टिकोण, एकाग्रता, कुशलता, दृढ़ परिश्रम और विपुल सामग्री की सहायता से जिस अनूठे व्याकरण शास्त्र का उपदेश दिया, उसे देखकर बड़े से बड़े विद्वान् आश्चर्य चकित होकर कहने लगे – 'पाणिनीयं महत्सुविरचितम्' – पाणिनि का शास्त्र महान् और सुविरचित है; 'महती सूक्ष्मेक्षिका वर्तते सूत्रकारस्य' उनकी दृष्टि अत्यन्त पैनी है; 'शोभना खलु पाणिनेः सूत्रस्य कृतिः' उनकी रचना अति सुन्दर है; 'पाणिनिशब्दो लोके प्रकाशते' सारे लोक में पाणिनि का नाम छा गया है, इत्यादि। भाष्यकार ने पाणिनि को प्रमाणभूत आचार्य, माङ्गलिक आचार्य, सुहृद्, भगवान आदि विशेषणों से सम्बोधित किया है। उनके अनुसार पाणिनि के सूत्र में एक भी शब्द अनर्थक नहीं हो सकता, और पाणिनीय शास्त्र में ऐसा कुछ नहीं है जो निरर्थक हो। उन्होंने जो सूत्र बनाए हैं, वे बहुत ही सोच विचार कर बनाए गए हैं। उन्होंने सुहृद् के रूप में व्याकरण शास्त्र का अन्वाख्यान किया है। रचना के समय उनकी दृष्टि भविष्य की ओर थी और वह दूरतर की बात सोचते थे। इस प्रकार उनकी प्रतिष्ठा बच्चे-बच्चे तक फैल गई और विद्यार्थियों में उन्हीं का व्याकरण सर्वाधिक प्रिय हुआ। व्याकरण और तत्वज्ञान में दूसरे प्रकार का भी सम्बन्ध भी प्रचीन काल से बहुत ग्रन्थों में बताया गया है। ऊपर दिये एक सम्बन्धों से भी यह अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है। उसका स्वरूप ऐसा होता है- व्याकरण शास्त्र का प्राचीन काल में दिया हुआ एक प्रसिद्ध नाम 'शब्दानुशासन' है। 'शब्दानुशासन' का अर्थ है, साधु (योग्य) शब्द से असाधु (अयोग्य) शब्दों को अलग करना। परन्तु शब्द का साधुत्व और असाधुत्व अर्थ सापेक्ष है, जैसे- 'स्वजन' शब्द, आप्त, स्वकीय सम्बन्धी के अर्थ में योग्य (साधु) है। उस अर्थ में 'श्वजन' शब्द पूर्ण असाधु है। फिर भी श्वजन शब्द सर्वथा असाधु ही है, ऐसा कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि कुत्ते का (रक्षक) मानव, अथवा कुत्तों का समूह इत्यादि अर्थ के लिए वह योग्य है। इसी तरह 'सकल' शब्द 'सर्व सम्पूर्ण' के अर्थ में साधु और 'टुकड़ा' अर्थ में असाधु है। 'शकल' शब्द सर्व 'अर्थ में असाधु और टुकड़ा' अर्थ में साधु है। इस तरह शब्दों का साधुत्व और असाधुत्व अर्थावलम्बी है, अन्यनिरपेक्ष अर्थात् केवल स्वरूपाश्रित नहीं है। इस विवेचन का मतलब यह है कि शब्द साधुत्व का विचार व्याकरण शास्त्र का प्रमुख उद्देश्य होते हुए भी शब्द से प्रतीत होने वाले अर्थ का ही व्याकरण शास्त्र में उपांग रूप से विचार करना अनिवार्य है।

अष्टाध्यायी अथवा पाणिनीयाष्टक

पाणिनि का व्याकरण शब्दानुशासन के नाम से विद्वानों में प्रसिद्ध है, परन्तु आठ अध्यायों में विभक्त होने के कारण यही शब्दानुशासन लोक में अष्टाध्यायी अथवा पाणिनीयाष्टक के रूप में जाना जाता है। पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी से संस्कृत भाषा को अमरता प्रदान की। उनकी व्याकरण की रीति से संस्कृत भाषा के सभी अङ्ग आलौकित हो उठे। सर्वशास्त्रोपकारक के रूप में पाणिनीय अष्टाध्यायी की सहायता से हमें कहीं भी अपना मार्ग ढूँढ़ने में कठिनाई नहीं होती है। संसार की अनेक भाषाएं नियमित व्याकरण के अभाव में या तो लुप्त हो गईं हैं, या इतनी दुरूह हैं कि उन्हें समझना ही दुष्कर हैं। किन्तु संस्कृत भाषा के गद्य और पद्य दोनों पाणिनि शास्त्र से नियमित होने के कारण सदा ही सुबोध बने रहे हैं। आज भी हम पाणिनीय अष्टाध्यायी की सहायता से संस्कृत के प्राचीनतम साहित्य से लेकर नवीनतम रचनाओं का रसास्वाद कर सकते हैं। अपने व्याकरण को पूर्व एवं सर्वग्राही बनाने के लिए पाणिनि ने देशाटन कर भारत के विभिन्न जनपदों की भाषा, उनके रीति–व्यवहार, वेशभूषा, उद्योग–धन्धे तथा उनके व्यक्ति और जाति–वाचक नामों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया। अतः उनका व्याकरण न केवल शब्दानुशासन की दृष्टि से परिपूर्ण है, अपितु वह तत्कालीन सभ्यता और संस्कृति का विश्वसनीय और प्रामाणिक इतिहास भी है। पणिनीय व्याकरण इतना सुव्यवस्थित, वैज्ञानिक, लाघवपूर्ण और सर्वाङ्गपूर्ण सिद्ध हुआ कि उनके सामने समस्त व्याकरण गौण हो गए। यहाँ तक कि धीरे धीरे प्रादेशिक व्याकरणों का प्रचलन बन्द हो गया और कालान्तर में वे नष्टप्राय हो गए। पाणिनीय अष्टाध्यायी के आठ अध्यायों में से प्रत्येक अध्याय में चार पद हैं और कुल मिलाकर लगभग चार हज़ार सूत्र हैं। अष्टाध्यायी की सूत्र संख्या के विषय में विद्वानों में थोड़ा विवाद है। कुछ विद्वान् इसके सूत्रों की संख्या 3981 मानते हैं। इनमें यदि 14 प्रत्याहार–सूत्र जोड़ दें तो यह संख्या 3995 हो जाती है। अष्टाध्यायी को वेदाङ्ग मानने वालों की परम्परा में प्रचलित मौखिक पाठ में यह संख्या 3983 है। काशिका और सिद्धान्त–कौमुदी के परम्परागत पाठ के अनुसार 3983 संख्या ही दी हुई है।

अष्टाध्यायी के अध्याय

व्याकरणीय प्रक्रिया की दृष्टि से अष्टाध्यायी को मुख्य रूप से तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है। एक, वाक्यों के पदों का संकलन (1–2 अध्याय); दो, पदों का प्रकृति–प्रत्यय में विभाग (3–5 अध्याय); तीन, प्रकृति–प्रत्ययों के साथ आगम आदेशादि का संयोजन कर परिनिष्ठित पदों का निर्माण (6–8 अध्याय)। अष्टाध्यायी के प्रथम दो अध्यायों में पदों के सुबन्त, तिङन्त भेदों और वाक्यों में उनके परस्पर सम्बन्ध पर विचार किया गया है। तृतीय अध्याय में धातुओं से शब्द–सिद्धि का विवेचन तथा चतुर्थ और पञ्चम अध्याय में प्रातिपदिकों एवं शब्द सिद्धि का विचार है। षष्ठ एवं सप्तम अध्यायों में सुबन्त एवं तिङन्त शब्दों की प्रकृति–प्रत्ययात्मक सिद्धि एवं स्वरों का विवेचन है, तथा अष्टम अध्याय में सन्निहित पदों के शीघ्रोच्चारण से वर्णों या स्वरों पर पड़ने वाले प्रभाव की चर्चा है। यदि प्रतिपाद्य विषयों की दृष्टि से विचार किया जाए तो संज्ञा और परिभाषा, स्वरों और व्यंजनों के प्रकार, धातुसिद्ध क्रियापद, कारक, विभक्ति, एकशेष समास, कृदन्त, सुबन्त, तद्धित, आगम और आदेश, स्वर विचार, दित्व और सन्धि – ये अष्टाध्यायी के प्रतिपाद्य विषय हैं।