बिमल गुरुंग
बिमल गुरुंग एक भारतीय राजनीतिज्ञ हैं और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (GJM) के संस्थापकों में से एक हैं। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा एक राजनीतिक दल है जो भारत के भीतर एक अलग गोरखालैंड राज्य के गठन की मांग करता है। वह गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन के चेयरपर्सन थे, जो एक अर्ध-स्वायत्त निकाय है जो पश्चिम बंगाल राज्य के भीतर पहाड़ी क्षेत्रों या दार्जिलिंग जिले और तराई को नियंत्रित करता है। बिमल गुरुंग पिछले काफी वर्षों से नेपाली भाषा और नेपाली समाज की लगातार सेवा कर रहे हैं। जुलाई, 1976 में जन्म गुरुंग और उनके सहयोगियों पर दार्जिलिंग पहाड़ियों में शांति भंग करने के लिए कथित तौर पर जिम्मेदार ठहराया गया। तब से (2017) से निर्वासिद जीवन जी रहे हैं।

डीजीएचसी

बिमल गुरुंग सबसे पहले गोरखा नेशनल लिबरेश फ्रंट (जीएनएलएफ) के कोर सदस्य बने। यह संस्था भारत में गोरखालैंड राज्य के निर्माण के लिए काफी समय से लड़ाई लड़ रही थी। पार्षद रुद्र प्रधान की हत्या के बाद वे दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (डीजीएचसी) में केतुकवर निर्वाचण क्षेत्र से पार्षद बने। वह जीएनएलएफ के नेता और डीजीएचसी के पूर्व अध्यक्ष सुभाष घीसिंह के करीबी सहयोगी रहे। बाद में, उनका गोरखालैंड राज्य के लिए दूसरा आंदोलन शुरू करने को लेकर अपने संरक्षक से मतभेद हो गए,

छठी अनुसूची

चौथा DGHC चुनाव 2004 में होने वाले थे। हालांकि, सरकार ने चुनाव नहीं कराने का फैसला किया और इसके बजाय सुभाष घिसिंह को छठी अनुसूची परिषद की स्थापना तक DGHC का एकमात्र कार्यवाहक बना दिया। अधिकांश अन्य राजनीतिक दलों और संगठनों ने छठी अनुसूची जनजातीय परिषद की स्थापना का विरोध किया क्योंकि डीजीएचसी क्षेत्र में केवल अल्पसंख्यक जनजातीय आबादी थी। डीजीएचसी के पूर्व पार्षदों में नाराजगी भी तेजी से बढ़ी। बिमल गुरुंग ने तब जीएनएलएफ से अलग होने का फैसला कर लिया। 2007 में दार्जिलिंग के एक भारतीय आइडल उम्मीदवार प्रशांत तमांग के लिए एक बड़े पैमाने पर समर्थन पर सवार होकर, बिमल ने प्रशांत का समर्थन करने के लिए प्राप्त जन समर्थन के आधार पर कदम आगे बढ़ाए। देखते ही देखते बिमल को लोगों का समर्थन मिलना शुरू हो गया। घीसिंह ने मार्च 2008 में डीजीएचसी की अध्यक्षता से इस्तीफा दे दिया और अपना निवास स्थान बदल कर जलपाईगुड़ी कर लिया। जीएनएलएफ के अधिकांश समर्थक और कैडर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा, बिमल गुरुंग के नेतृत्व वाली नई पार्टी में शामिल हो गए।

गोरखालैंड की मांग

जीजेएम के गठन के तुरंत बाद, बिमल ने दार्जिलिंग जिले और डुआर्स के कई क्षेत्रों को मिलाकर एक गोरखालैंड राज्य के गठन की मांग को फिर से उठाया। प्रस्तावित राज्य का कुल क्षेत्रफल 6450 किमी रखा गया और इनमें बनारहाट, भक्तिनगर, बीरपारा, चेल्सा, दार्जिलिंग, जयगांव, कलचीनी, कालिम्पोंग, कुमारग्राम, कुरसेओंग, मदारीहाट, मालबाजार, मिरिक और नगरकट्टा क्षेत्र शामिल हैं। 1980 के दशक के विपरीत, जीजेएम ने कहा, गोरखालैंड के लिए संघर्ष अहिंसा और असहयोग के माध्यम से होगा। बिमल को दार्जिलिंग जिले, डूआर्स और भारत के अन्य हिस्सों के लोगों से उनकी राज्य की मांग के लिए बड़े पैमाने पर समर्थन मिला। लेकिन मई 2010 में एबीजीएल के पूर्व प्रमुख मदन तमांग की हत्या के विवादास्पद मुद्दे के बाद, जिसमें गुरुंग को काफी हद तक जुड़ा हुआ माना जाता है, जीजेएम के कई प्रमुख नेता जैसे त्रिलोक दीवान, अमर सिंह राय, अमर लामा, अनमोल प्रसाद और पैलडेन लामा ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। पश्चिम बंगाल में TMC-INC गठबंधन सरकार के सत्ता में आने के बाद 2011 में दार्जिलिंग सामान्य स्थिति में लौट आया। 2011 में भारत सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार और जीजेएम के बीच त्रिपक्षीय जीटीए समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। ऐसा लगता है कि यह अल्पकालिक है और जीजेएम ने गोरखालैंड के मुद्दे को फिर से उठाया है और जून 2017 में दार्जिलिंग में अनिश्चितकालीन बंद का आह्वान किया। कुछ समय पहले ही केंद्र सरकार ने गोरखालैंड मुद्दे पर त्रिपक्षयी वार्ता के लिए बुलाया था। बिमल गुरुंग ने कहा, उनका गोरखालैंड का मुद्दा अभी बरकरार है।